तारादेवी-शिमला रोपवे सिरे नहीं चढ़ने से सीजीएम को चौथी बार एक्सटेंशन मिलना मुश्किल

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तारादेवी से शिमला तक हवा में झूलने का सपना दिखाने वाला रोपवे प्रोजेक्ट अब खुद हवा में लटका है। और उसके साथ लटक गई है मुख्य महाप्रबंधक अजय शर्मा की चौथी एक्सटेंशन की उम्मीद। इस रोपवे परियोजना के लिए बार-बार एक ही निविदा आने के बाद प्रदेश सरकार ने निरस्त कर दिया है। अब नए सिरे से तारादेवी-शिमला रोपवे परियोजना पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानि पीपीपी मोड फार्मूले पर बनेगी। सरकार की ओर से पिछले दो साल की निविदा संबंधी पूरी की जा रही औपचारिकताओं को नए सिरे से पीपीपी मोड पर शुरू करने के लिए कहा गया है। ऐसे में रोपवे निगम में मुख्य महाप्रबंधक अजय शर्मा को एक्सटेंशन मिलना संभव नहीं है।

तारादेवी-शिमला रोपवे को पर्यटन का गेमचेंजर बताया गया था। दावा था कि 14 मिनट में भक्त तारादेवी मंदिर पहुंचेंगे और जाम से जूझता शिमला राहत की सांस लेगा। पर जमीन पर एक खंभा भी नहीं लगा और सीजीएम को तीन-तीन एक्सटेंशन मिल गईं। हर बार तर्क यही था, साहब के बिना प्रोजेक्ट कौन चलाएगा ?” अब सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है। नई पालिसी के तहत प्रोजेक्ट प्राइवेट कंपनी बनाएगी। यानी सरकारी अफसर की जरूरत ही खत्म।

वित्तीय स्थिति के कारण पीपीपी मोड

पिछले दो साल से तारादेवी-शिमला रोपवे को सरकार के सार्वजनिक उपक्रम रोपवे निगम के जरिये निर्मित करने के प्रयास अंतत: राज्य की खराब वित्तीय स्थिति के मद्देनजर धराशायी हो गए हैं। प्रदेश सरकार ने आखिरकार इस रोपवे परियोजना को पीपीपी मोड पर बनाने का निर्णय लिया है। एनडीबी के साथ सिलसिलेवार कई बैठकें आयोजित होने के बाद डीपीआर तक तैयार करवाई गई थी। इस परियोजना की आरंभिक लागत 1734.40 करोड़ से बढ़कर 2980 करोड़ पहुंच गई है। प्रदेश की वर्तमान वित्तीय स्थिति को देखते हुए प्रदेश सरकार ने अपनी हिस्सेदारी चुकाने में भी असमर्थता जाहिर की है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार ने निजी भागीदारी में इस परियोजना को निर्मित करने का निर्णय लिया है।

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