आर्थिक संकट के चौराहे पर खड़ा हिमाचल

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प्रदेश की अर्थव्यवस्था ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां पर विकसित हिमाचल की तस्वीर बनती नजर नहीं आ रही है। इसके पीछे एक नहीं, अब तो कई ऐसे कारण खड़े हो चुके हैं कि अर्थव्यवस्था को किस तरह से सुधारा जा सकता है। राज्य आर्थिक संकट की दहलीज पर खड़ा है और नित्य खर्च चलाने के रास्ते खोज रहा है। चार दशक पहले तक प्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि का आधार रखती थी और धीरे-धीरे ये आधार खिसकता चला गया। इसके पीछे कारण ये रहा कि किसानी करने के लिए प्रगतिशील कदम उठाने की आवश्यकता थी, जिसे किसान स्वयं उठाने की स्थिति में नहीं था।

उसके बाद ऊर्जा क्षेत्र प्रगति करने लगा और पिछले डेढ़ दशक में ऊर्जा क्षेत्र को ऐसा ग्रहण लगा कि खुले बाजार में प्रदेश की विद्युत खरीददारी कम होती चली गई। पर्यटन क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बाहर निकाल दिया जाए तो पर्यटकों की आमद भी उत्साहजनक नहीं है। सेब राज्य में सेब आर्थिक पांच हजार करोड़ से आगे का आंकड़ा छूने के लिए तरस रही है। औद्योगिक क्षेत्र राज्य में रेलवे विस्तार नहीं होने के कारण सीमावर्ती क्षेत्र तक सीमित रह गया है।

वेतन-पेंशन निगल जाता है बजट

जम्मू-कश्मीर के बाद हिमाचल प्रदेश देश का ऐसा दूसरा राज्य है, जहां पर सरकार के बजट का अधिकांश हिस्सा कर्मचारियों का वेतन और पेंशनरों की पेंशन निगल जाती है। दोनों राज्यों की जनसंख्या का करीब तीन फीसदी हिस्सा सरकारी नौकरियों में है। देश के अन्य राज्यों में ऐसा नहीं है। सरकार के बजट को आधार बनाया जाए तो मुख्य निर्माण कार्य के लिए 9.89 फीसदी यानि 5782.31 करोड़ की धनराशि दिखाई गई है। वेतन 14687.51 करोड़ में मजदूरी 278.46 करोड़ और सहायता अनुदान वेतन 2280.90 करोड़ को भी जोड़ दिया जाए तो कमोवेश वेतन पर सरकार को 17246.87 करोड़ खर्च होते हैं। वेतन-पेंशन, ऋण, ब्याज पर कुल 71 फीसदी खर्च होते हैं।

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