हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने एक बार फिर से दोहराया है कि तीन निर्दलीय विधायकों केएल ठाकुर, होशियार सिंह व आशीष शर्मा का त्याग पत्र स्वीकारने के मामले में संज्ञान लेना चाहिए। राजभवन में आज मीडिया से बात करते हुए राज्यपाल शुक्ल ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि मैंने तीन निर्दलीय विधायकों के त्याग पत्र के संदर्भ में कर्नाटक व मध्य प्रदेश और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों की जानकारी दी थी। हो सकता है कि विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने न्यायालयों की ओर से आए निर्णयों के संबंध में संज्ञान लिया होगा। जहां तक तीनों निर्दलीय विधायकों का त्याग पत्र स्वीकार करने की बात है तो इस बारे में विधानसभा अध्यक्ष को ही स्वयं निर्णय लेना है। निर्दलीय विधायकों के त्याग पत्र मामले पर आगे उनका कहना ये भी था कि सबकी भलाई और बुराई सबके साथ रहती है। उन्होंने ये भी कहा कि राजभवन इस मामले में कुछ कर नहीं सकता है, न ही कोई संविधानिक अधिकार प्राप्त है। इससे पहले तीनों निर्दलीय विधायकों ने राजभवन जाकर राज्यपाल शुक्ल को त्याग पत्र सौंपा था, जिसे राज्यपाल ने आगामी कार्रवाई करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को तुरंत भेज दिया था। उस समय उन्हाेंने इस बात को विधानसभा अध्यक्ष के ध्यान में लाया था कि विधायक की ओर से व्यक्तिगत तौर पर सौंपा गया त्याग पत्र स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ऐसा कहता है।
22 मार्च को तीनों निर्दलीय विधायकों ने त्याग पत्र दिया था
प्रदेश की 15वीं विधानसभा में चुनकर आए तीनों निर्दलीय विधायकों केएल ठाकुर, होशियार सिंह व आशीष शर्मा ने 22 मार्च को सबसे पहले विधानसभा जाकर सचिव यशपाल शर्मा को त्याग पत्र दिया था। उसके बाद उपरांत राजभवन आकर राज्यपाल शुक्ल को भी तीनों निर्दलीय विधायकों ने त्याग पत्र की प्रति सौंपी थी। उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया के आवास पर जाकर पहले उनके पैर छुए थे और एक-एक करके त्याग पत्र दिया था। उसके बाद विधानसभा आकर अध्यक्ष के चैंबर में कुलदीप सिंह पठानिया को एक बार फिर से त्याग पत्र सौंपा था।
30 मार्च को विधानसभा में धरना दिया था
तीनों निर्दलीय विधायकों ने त्यागपत्र स्वीकार नहीं करने पर विधानसभा में धरना दिया था। विधानसभा पुस्तकालय के बाहर धरने पर बैठे तीनों निर्दलीय विधायकों ने हाथों में बोर्ड लिए हुए थे, जिनपर लिखा हुआ था कि हमने विधानसभा की सदस्यता से स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया है और हमारा त्याग पत्र शीघ्रता से स्वीकार किया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णयों को दृष्टिगत रखते हुए
हिमाचल प्रदेश की 15वीं विधानसभा में तीन निर्दलीय विधायकों की ओर से दिए गए त्याग पत्र को लेकर उपजी स्थिति में संविधान के प्रविधान और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं:
1. संविधान के अनुच्छेद 190, 3 बी में प्रविधान है कि विधानसभा का कोई भी सदस्य सदस्यता से त्याग पत्र देने के लिए स्वतंत्र है। सदस्य को त्याग पत्र नहीं देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
2. विधानसभा के रूल्स आफ बिजनेस के रूल नंबर 287-2 में सदस्यता से त्याग पत्र देने वाला सदस्य व्यक्तिगत तौर पर अध्यक्ष को सौंपता है। तो ऐसे सदस्य का त्याग पत्र स्वीकार करना पड़ेगा।
3. विधानसभा के रूल्स आफ बिजनेस में रूल नंबर-287-3 में कोई सदस्य डाक से त्याग पत्र भेजता है, तो विधानसभा अध्यक्ष चाहे तो त्याग पत्र देने वाले सदस्य से पूछताछ कर सकता है।
क्या कहते हैं कर्नाटक व मध्यप्रदेश के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के दो निर्णय
कर्नाटक और मध्यप्रदेश विधानसभा में त्याग पत्र संबंधी याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों राज्यों के विधानसभा अध्यक्ष को आदेश दिया था कि त्याग पत्र देने वाले सदस्यों का त्याग पत्र स्वीकार किया जाए।
कर्नाटक में श्रीमंत बाला साहिब अन्य विरूद्ध विधानसभा अध्यक्ष सिविल रिट पिटीशन-992-2019
मध्यप्रदेश में शिवराज चौहान अन्य विरूद्ध विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ सिविल रिट पिटीशन-449-2020
क्या था मामला
22 मार्च हिमाचल प्रदेश की 15वीं विधानसभा की सदस्यता से तीन निर्दलीय विधायकों होशियार सिंह, आशीष शर्मा व केएल ठाकुर ने त्याग पत्र दिया। त्याग पत्र तीनों विधायकों ने व्यक्तिगत तौर पर सर्व प्रथम विधानसभा सचिव को सौंपा। उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष को उनके आवास पर और उसके बाद विधानसभा चैंबर में सौंपा। सात दिन गुजर जाने के बाद भी तीनों निर्दलीय विधायकों का त्याग पत्र स्वीकार नहीं किया गया। इसके स्थान पर तीनों विधायकों को 21 मार्च को विधानसभा सचिवालय की ओर से 10 अप्रैल को दोपहर 12.15 बजे व्यक्तिगत तौर पर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष पेश होने का नोटिस दिया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय जाना पड़ेगा
जिस तरह से विधानसभा सचिवालय की ओर से तीनों निर्दलीय विधायकों को सुनवाई के लिए 10 अप्रैल को बुलाया गया है। ऐसे में इन विधायकों का त्याग पत्र शीघ्र स्वीकार होता नजर नहीं आ रहा है। कुल मिलाकर प्रदेश में छह विधानसभा सीटों के लिए हो रहे उपचुनाव के साथ इन तीन सीटों के लिए चुनाव होना नजर नहीं आ रहा है।

