पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रेरक उदाहरण शिमला से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित मंढोल गांव से सामने आया है, जहां गांव की महिलाओं ने बीते दस वर्षों से लगातार पौधारोपण और संरक्षण अभियान चलाकर प्रकृति के संतुलन को सहेजने का बीड़ा उठाया है। इन महिलाओं का प्रयास केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने लगाए गए पौधों की देखभाल, सुरक्षा और संवर्धन को भी अपनी जिम्मेदारी बनाया है।
गांव की महिलाएं हर वर्ष बरसात के मौसम में सामूहिक रूप से पौधारोपण करती हैं और उसके बाद पूरे साल उनकी निगरानी करती हैं। गर्मियों के दौरान जब जंगलों में आग लगने की घटनाएं होती हैं, तब ये महिलाएं स्वयं आगे बढ़कर पौधों और छोटे पेड़ों को बचाने के लिए मौके पर पहुंच जाती हैं। उनकी सजगता और मेहनत का ही परिणाम है कि आज उनके द्वारा लगाए गए हजारों पौधे घने पेड़ों का रूप ले चुके हैं, जिससे न केवल हरियाली बढ़ी है बल्कि स्थानीय जैव-विविधता को भी संबल मिला है।
महिलाओं के इस पर्यावरणीय आंदोलन का प्रभाव अब नई पीढ़ी पर भी दिखने लगा है। गांव के युवा भी इस अभियान से जुड़ गए हैं और कंधे से कंधा मिलाकर पौधारोपण, जंगलों की निगरानी और आग से बचाव के कार्यों में सहयोग कर रहे हैं। सामूहिक प्रयासों से गांव के आसपास का क्षेत्र हरित आवरण से ढकने लगा है, जिससे जल संरक्षण, मृदा संरक्षण और स्थानीय जलवायु संतुलन को भी मजबूती मिली है। ग्रामीणों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण से ही भविष्य सुरक्षित है और यही आत्मनिर्भर भारत की सशक्त नींव है। महिलाओं का यह अभियान आज अन्य गांवों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।

